आईआईटी कानपुर और NCRA पुणे के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि, विकसित किया पल्सर की दूरी मापने का नया तरीका
Kanpur , 25 February 2026
Source: Information and Media Outreach Cell, IIT Kanpur
कानपुर, 25 फरवरी 2026: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के भौतिकी विभाग तथा स्पेस, प्लैनेटरी एंड एस्ट्रोनॉमिकल साइंसेज एंड इंजीनियरिंग (SPASE) इकाई और नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स पुणे के खगोल वैज्ञानिकों ने आवधिक रेडियो तरंगें उत्सर्जित करने वाले तारों — जैसे पल्सर — की दूरी मापने का एक नया और प्रभावी तरीका विकसित किया है। यह शोध “Probing the morphology of the Gum Nebula using pulsar observables and a novel distance estimation method” शीर्षक से Oxford University Press द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित जर्नल Monthly Notices of the Royal Astronomical Society (MNRAS) पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन को डॉ. आशीष कुमार (वर्तमान में NCRA पुणे में), प्रो. अविनाश ए. देशपांडे (एक्स. RRI बेंगलुरु) और प्रो. पंकज जैन (आईआईटी कानपुर)ने संयुक्त रूप से किया है।
तारों की सही दूरी मापना खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। आकाश में किसी तारे की दिशा ज्ञात करना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन उसकी वास्तविक दूरी निर्धारित करना कठिन होता है। दूरी मापने का सबसे विश्वसनीय तरीका त्रिकोणमितीय पैरालैक्स (Trigonometric Parallax) है, किंतु यह केवल निकटवर्ती तारों पर ही प्रभावी रूप से लागू होता है। अन्य विधियों, जैसे न्यूट्रल हाइड्रोजन आधारित तकनीकों में, त्रुटि की संभावना अधिक रहती है।
शोध टीम द्वारा विकसित नई विधि पल्सर से प्राप्त रेडियो तरंगों पर अंतरिक्ष में पड़ने वाले दो प्रमुख प्रभावों के संयुक्त विश्लेषण पर आधारित है — विक्षेपण माप (Dispersion Measure) और प्रकीर्णन-जनित विस्तार (Scatter Broadening)। अंतरिक्ष पूर्णतः रिक्त नहीं है; उसमें कम घनत्व वाले कण और मुक्त इलेक्ट्रॉनों का वितरण होता है, जिसे अंतरतारकीय माध्यम कहा जाता है। यही माध्यम रेडियो तरंगों के प्रसार को प्रभावित करता है।
मुक्त इलेक्ट्रॉन रेडियो संकेतों में दो प्रकार के प्रभाव उत्पन्न करते हैं। पहला, वे अलग-अलग तरंगदैर्ध्य की तरंगों को भिन्न मात्रा में विलंबित करते हैं — इसे विक्षेपण कहा जाता है। दूसरा, वे तरंगों का प्रकीर्णन करते हैं, जिससे पल्सर संकेत का फैलाव या चौड़ाई बढ़ जाती है। दूरी बढ़ने के साथ विक्षेपण और प्रकीर्णन — दोनों प्रभाव बढ़ते हैं, हालांकि उनकी निर्भरता अलग-अलग प्रकार से होती है।
विक्षेपण माप संकेत के मार्ग में उपस्थित कुल मुक्त इलेक्ट्रॉन मात्रा का संकेत देता है, जबकि प्रकीर्णन इस बात पर निर्भर करता है कि माध्यम में पदार्थ किस प्रकार वितरित है। इन दोनों मानों के संयुक्त विश्लेषण से शोधकर्ता तय कर सकते हैं कि संकेत ने अंतरतारकीय माध्यम में कितनी दूरी तय की है। यह नई पद्धति NE2001 और YMW16 जैसे मौजूदा गलैक्टिक मुक्त-इलेक्ट्रॉन घनत्व मॉडलों पर निर्भरता को काफी कम करती है।
शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को हमारी आकाशगंगा के दक्षिणी भाग में स्थित विशाल गैसीय क्षेत्र गम नीहारिका (Gum Nebula) की दिशा में मौजूद पल्सरों पर लागू कर इसकी उपयोगिता प्रदर्शित की है। यह विधि उन सैकड़ों ज्ञात पल्सरों पर भी लागू की जा सकती है, जिनके प्रेक्षणीय आँकड़े पहले से उपलब्ध हैं।
इस पद्धति के व्यापक उपयोग से आकाशगंगा के इलेक्ट्रॉन घनत्व मॉडल अधिक सटीक बनाए जा सकेंगे तथा पल्सरों की वास्तविक गति, स्थिति और रेडियो चमक का बेहतर अनुमान संभव होगा। इसके अतिरिक्त, यह तरीका बाह्य-आकाशगंगीय तीव्र रेडियो फ्लैश — जैसे फास्ट रेडियो बर्स्ट (Fast Radio Bursts) — की दूरी और उनके परिवेश को समझने में भी सहायक सिद्ध हो सकता है।
आईआईटी कानपुर के बारे में
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