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भा.प्रौ.सं.कानपुर

आईआईटी कानपुर का अध्ययन: मस्तिष्क और पेट के संकेतों से 7–10 दिनों में अवसाद उपचार के परिणाम का अनुमान

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आईआईटी कानपुर का अध्ययन: मस्तिष्क और पेट के संकेतों से 7–10 दिनों में अवसाद उपचार के परिणाम का अनुमान

Kanpur , 31 August 2026

Source: Information and Media Outreach Cell, IIT Kanpur

कानपुर, 31 अगस्त, 2026: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (आईआईटी कानपुर) के शोधकर्ताओं ने गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (जीएसवीएम) मेडिकल कॉलेज, कानपुर के सहयोग से एक अध्ययन में पाया है कि मस्तिष्क (ब्रेन) और पेट (गट) की विद्युत गतिविधियों के संकेतों तथा मरीज के चिकित्सीय लक्षणों के आधार पर, एंटीडिप्रेसेंट (अवसादरोधी) दवा शुरू होने के केवल 7–10 दिनों के भीतर उसके उपचार के परिणाम का अनुमान लगाया जा सकता है। यह तरीका उपचार के प्रभाव का आकलन पारंपरिक 4–6 सप्ताह की तुलना में कहीं पहले करने में मदद कर सकता है।

दुनिया भर में लगभग 5 प्रतिशत वयस्क और भारत में लगभग 4.5 प्रतिशत लोग अवसाद (डिप्रेशन) से प्रभावित हैं। इनमें से आधे से ज्यादा मरीजों पर पहली एंटीडिप्रेसेंट दवा प्रभावी नहीं होती, जिसके कारण सही दवा चुनने में कई सप्ताह लग जाते हैं। ऐसे में उपचार के परिणाम का शुरुआती अनुमान लगाने की यह क्षमता अवसाद के इलाज की एक बड़ी चुनौती को कम करने में मदद कर सकती है।

आईआईटी कानपुर के कॉग्निटिव साइंस विभाग की सहायक प्रोफेसर एवं इस अध्ययन की कॉरस्पॉडिंग ऑथर डॉ. प्रगति प्रियदर्शिनी बालासुब्रमणि ने कहा, "हमारे अध्ययन से पता चलता है कि उपचार के पहले सप्ताह में मस्तिष्क और पेट से प्राप्त नॉन इनवेसिव विद्युत संकेत मरीज के उपचार की प्रतिक्रिया के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इससे उपचार को अधिक सटीक तरीके से तय करने में सहायता मिल सकती है।"

आईआईटी कानपुर के कॉग्निटिव साइंस विभाग के पीएचडी शोधार्थी तथा इस अध्ययन के प्रथम लेखक अमल जूड एश्विन फ्रांसिस ने कहा, "हमने पाया कि अलग-अलग मरीजों में दिखाई देने वाले लक्षण, मस्तिष्क और पेट की अलग-अलग जैविक गतिविधियों से जुड़े होते हैं। इन जैविक अंतरों को समझने से यह पता चलता है कि एक ही दवा का असर सभी मरीजों पर समान क्यों नहीं होता। इससे प्रत्येक मरीज के लिए अधिक व्यक्तिगत उपचार रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।"

रिसर्च में शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (EEG) और इलेक्ट्रोगैस्ट्रोग्राफी (EGG) की सहायता से क्रमशः मस्तिष्क और पेट की विद्युत गतिविधियों का अध्ययन किया। इन संकेतों के साथ मरीजों के चिकित्सीय लक्षणों का भी विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि उपचार शुरू होने के पहले 7–10 दिनों के भीतर दर्ज किए गए ये संकेत यह पहचानने में मदद कर सकते हैं कि किन मरीजों पर एंटीडिप्रेसेंट दवा प्रभावी नहीं होगी।

इस अध्ययन में कुल 206 प्रतिभागियों को शामिल किया गया, जिनमें 144 ऐसे मरीज थे जिन्होंने पहले कभी अवसाद का उपचार नहीं कराया था। शोधकर्ताओं ने उपचार शुरू होने के समय और लगभग एक सप्ताह बाद EEG तथा EGG संकेत रिकॉर्ड किए। इसके बाद इन शुरुआती जैविक संकेतों और चिकित्सीय जानकारी के आधार पर यह आकलन किया गया कि 4–6 सप्ताह बाद उपचार का परिणाम क्या होगा।

विकसित मॉडल ने उपचार का अपेक्षित लाभ न मिलने वाले मरीजों की पहचान 84 प्रतिशत सेंसिटिविटी और 78 प्रतिशत स्पेसिफिसिटी के साथ की। वहीं, एक इंडिपेंडेंट पेशेंट कोहर्ट पर परीक्षण करने पर इस मॉडल ने 77.3 प्रतिशत समग्र सटीकता हासिल की। साथ ही, उपचार का लाभ न मिलने वाले मरीजों की पहचान में इसने 80 प्रतिशत विशिष्टता और 71.4 प्रतिशत संवेदनशीलता दर्ज की।

अध्ययन में विकसित तकनीकें वर्तमान में न्यूरोक्लिनिकल इनोवेटिव सॉल्यूशंस (NCIS) प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से उपलब्ध हैं। इस ट्रांसलेशनल प्रोजेक्ट को जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) से वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ है। इस सहयोग ने शोध को प्रयोगशाला से वास्तविक चिकित्सीय उपयोग तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे भविष्य में अवसाद के मरीजों के लिए अधिक व्यक्तिगत और समय पर उपचार संबंधी निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।

यह अध्ययन अवसाद के उपचार को अधिक तेज़, प्रभावी और व्यक्तिगत बनाने की दिशा में नई संभावनाएं प्रस्तुत करता है। हालांकि, इस पद्धति को व्यापक रूप से अपनाने से पहले विभिन्न क्षेत्रों और अधिक संख्या में मरीजों पर आगे और अध्ययन किए जाने की आवश्यकता होगी।

प्रकाशन

फ़्रांसिस ए.जे.ए., बाजपेयी, ए., बालासुब्रमणि, एन.पी. तिवारी, एच.पी. सिंह, एस. चावला, के. सिंह, ए.डी. चौधरी, डी.एंड बालासुब्रमणि, पी.पी. (2026)। दिमाग और पेट की विद्युत गतिविधियों के आधार पर अवसाद के अलग-अलग प्रकारों की पहचान और दवा के असर का शुरुआती अनुमान: एक बहुकेंद्रीय चिकित्सकीय अध्ययन। फ्रंटियर्स इन साइकियाट्री, 17, आर्टिकल 1823806।

डीओआई:10.3389/fpsyt.2026.1823806

लेख: https://www.frontiersin.org/journals/psychiatry/articles/10.3389/fpsyt.2026.1823806/full

लेखक:अमल जूड अश्विन फ्रांसिस¹, आलोक बाजपेयी¹†, नंदिनी प्रियंका बालासुब्रमणि¹†, हरि प्रकाश तिवारी¹, शिखा सिंह², कृतिका चावला², आयुषी देवेन्द्र सिंह², धनंजय चौधरी²†, और प्रगति प्रियदर्शिनी बालासुब्रमणि¹†* (संवाददाता लेखक) ¹संज्ञानात्मक विज्ञान विभाग, ट्रांसलेशनल न्यूरोसाइंस और प्रौद्योगिकी (TRANSiT) लैब, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर, भारत²; मनोरोग विभाग, गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (जीएसवीएम) मेडिकल कॉलेज, कानपुर, भारत।

यह अध्ययन क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया (CTRI/2025/04/084404) में पंजीकृत है और इसे आईआईटी कानपुर और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज की संस्थागत नैतिक समितियों से नैतिक स्वीकृति मिली है।

आईआईटी कानपुर के बारे में

1959 में स्थापित, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त है। विज्ञान और इंजीनियरिंग शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध, आईआईटी कानपुर ने अनुसंधान और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसका 1,050 एकड़ का हरा-भरा परिसर शैक्षणिक और अनुसंधान संसाधनों से समृद्ध है। संस्थान में 21 विभाग, तीन अंतर्विषयी कार्यक्रम, 27 केंद्र और तीन विशेष स्कूल हैं, जो इंजीनियरिंग, विज्ञान, डिजाइन, मानविकी और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों को समाहित करते हैं। 590 से अधिक पूर्णकालिक फैकल्टी और 9,500 से अधिक छात्रों के साथ, आईआईटी कानपुर नवाचार और शैक्षणिक उत्कृष्टता में अग्रणी बना हुआ है।

अधिक जानकारी के लिए विज़िट करें: www.iitk.ac.in